Ghazal | Koi Gham Ki Surat Kya Jaane | कोई ग़म की सूरत क्या जाने

कोई ग़म की सूरत क्या जाने, वो शख़्स क़ाबिल-ए-महसूस है
जो मेरी सूरत को जाने, वो अक्स आज भी महफ़ूज़ है

आफ़्ताब को सोया रहने दो, मौसम के सीले लिहाफ़ में
बादल का सिंदूरी चेहरा, बेनूरी में मायूस है

उस इक जलवे की वहशत में, ईमान-ओ-दीन गँवा बैठें
पर जब याद उसे करते हैं, हम कहते हैं वो दिन बेहरोज़ है

ये तारीख़ है मशहूर-ए-ज़माना, और नक्शा भी नायाब है
समुंदर में हैं अंकल सैम, और शुमाल में चीन-ओ-रूस है

इस महफ़िल में हैं इतने नक़ाब, चेहरे भी कम पड़ जाते हैं
ये किसे पता था, ऐ सफ़र, वो क़ातिल ही अब जासूस है


Photograph Courtesy: Frantisek Krejci, Pixabay.

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